कलयुग में धर्म
- सन्दीप तोमर
“ठीक है बिना ताल के बेताल बता किस विषय पर तू मुझसे संवाद करना चाहता है?”
“जितने दिनों तक मैंने तेरी पीठ पर लदे हुए नगरों, महानगरों, कस्बों, गांवों कि यात्रा की है, एक बात मेरी समझ में आई है कि सामूहिक धार्मिक दुकानें यथा-मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारे आदि-आदि बनाने के पीछे मंशा यही रही होगी कि आमजन को उनकी पूजा/इबादत/शबद कीर्तन/ प्रेयर से परेशानी न हो लेकिन एक बात मेरे पल्ले नहीं पड़ती दिखावे में ये लोग गलियों, मोहल्लों, पार्को, सड़कों पर इस तरह के आयोजन कर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन यदा-कदा क्यों करते ही रहते हैं? मैं तुम्हारी राय जानना चाहता हूँ।“
विक्रम बोला-“इस तरह का दिखावा आस्था की बजाय दूसरों को परेशान करने की मंशा प्रदर्शित करता है। यह न ही आस्था है न ही भक्ति, कलयुग में धर्म सबसे बड़ा व्यवसाय बना है, जिसकी आड़ में नेता, अभिनेता, बाबाओं सबका व्यवसाय फल- फुल रहा है। ऐसे आयोजनों का विरोध लोगों को आस्था पर सवाल लगता है जबकि इन आयोजनों से आस्था कोसों दूर रहती है। लोग पूजा/इबादत/शबद कीर्तन/ प्रेयर करें, उस पर शासन और समाज के सभी नागरिक दोनों ही को आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन उनके लिए बनाए गए स्थलों पर, आपका धर्म, आपकी आस्था दूसरों की परेशानी का सबब बनने लगे तो वह धर्म/आस्था न होकर पाखण्ड है। तब सत्ता और बुद्धिजीवियों को कुछ उपाय करने चाहिए।“
“हे राजन! तू वाकई कमाल की सोच रखता है, तुझे तो सभी युगों में शासन करना चाहिए, तू ही चक्रवर्ती सम्राट कहलाने का हकदार है, लेकिन तेरे तर्क से मैं संतुष्ट हुआ इसलिए मैं चला।“-कहकर बेताल उड़ा ही था लेकिन उधर ग्यारह हजार वोल्ट के खम्बे से के तारों में जा उलझा।

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