Tuesday, 20 September 2022

विक्रम बेताल टॉक "कलयुग में धर्म"

 


कलयुग में धर्म

- सन्दीप तोमर 
 
ज्यों ही विक्रम ने सबसे ऊँचे टावर से बेताल को उतारकर पीठ पर डाला, वह बोल उठा,”ये तूने सही किया राजन, कुछ देर और तू न आता तो मेरी हालत इस रेडिएसन से खस्ता हो जाती। सुन! आज थोडा सा नियम बदलता हूँ, आज मैं कोई कहानी नहीं सुनाऊंगा, बस एक वार्तालाप करेंगे, अगर तेरे तर्क सटीक हुए तो मैं तेरी पीठ को छोड़ कर भाग जाऊंगा और अगर तूने सही तर्क नहीं दिए तो मैं तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े कार दूंगा।“
“ठीक है बिना ताल के बेताल बता किस विषय पर तू मुझसे संवाद करना चाहता है?”
“जितने दिनों तक मैंने तेरी पीठ पर लदे हुए नगरों, महानगरों, कस्बों, गांवों कि यात्रा की है, एक बात मेरी समझ में आई है कि सामूहिक धार्मिक दुकानें यथा-मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारे आदि-आदि बनाने के पीछे मंशा यही रही होगी कि आमजन को उनकी पूजा/इबादत/शबद कीर्तन/ प्रेयर से परेशानी न हो लेकिन एक बात मेरे पल्ले नहीं पड़ती दिखावे में ये लोग गलियों, मोहल्लों, पार्को, सड़कों पर इस तरह के आयोजन कर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन यदा-कदा क्यों करते ही रहते हैं? मैं तुम्हारी राय जानना चाहता हूँ।“
विक्रम बोला-“इस तरह का दिखावा आस्था की बजाय दूसरों को परेशान करने की मंशा प्रदर्शित करता है। यह न ही आस्था है न ही भक्ति, कलयुग में धर्म सबसे बड़ा व्यवसाय बना है, जिसकी आड़ में नेता, अभिनेता, बाबाओं सबका व्यवसाय फल- फुल रहा है। ऐसे आयोजनों का विरोध लोगों को आस्था पर सवाल लगता है जबकि इन आयोजनों से आस्था कोसों दूर रहती है। लोग पूजा/इबादत/शबद कीर्तन/ प्रेयर करें, उस पर शासन और समाज के सभी नागरिक दोनों ही को आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन उनके लिए बनाए गए स्थलों पर, आपका धर्म, आपकी आस्था दूसरों की परेशानी का सबब बनने लगे तो वह धर्म/आस्था न होकर पाखण्ड है। तब सत्ता और बुद्धिजीवियों को कुछ उपाय करने चाहिए।“
“हे राजन! तू वाकई कमाल की सोच रखता है, तुझे तो सभी युगों में शासन करना चाहिए, तू ही चक्रवर्ती सम्राट कहलाने का हकदार है, लेकिन तेरे तर्क से मैं संतुष्ट हुआ इसलिए मैं चला।“-कहकर बेताल उड़ा ही था लेकिन उधर ग्यारह हजार वोल्ट के खम्बे से के तारों में जा उलझा।
 
 
 

विक्रम बेताल टॉक "एंकर, धनिक और सरकारी कोकटेल"


 एंकर, धनिक और सरकारी कोकटेल

 - सन्दीप तोमर 

विक्रम ने एक बार फिर पेड़ पर लटका शव उतारा और कंधे पर लटका कर चल दिया। शव में स्थित बेताल ने कहा-“हे विक्रम तेरा हठ प्रशंसनीय है। रास्ता लंबा है सो तुझे अधिक थकान न हो इसलिये एक कथा सुनाता हूँ। कथा के आखिर में मैं तुझसे सवाल पूछूंगा, अगर तूने जानते-बूझते सही जवाब न दिया तो तेरे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे और अगर तेरा जवाब सही हुआ तो मैं वापस उड़ जाऊँगा।“

बेताल ने कथा शुरू की- सुन विक्रम! ये कहानी है तो छोटी सी पर इसके मायने बड़े हैं। आर्यावर्त के भरत खंड में एक देश हुआ करता था। देश था तो लोग थे, सरकार थी और मीडिया भी था। सरकार के कुछ आलोचक थेकुछ समर्थक परन्तु भगत ज्यादा थे।

सरकार जानती थी कि देश में बिना धनिकों का अनुगामी बने लम्बे समय तक भगतों के दिलों में स्थान नहीं बनाये रखा जा सकता है। धनिकों ने मिडिया को खरीद सरकार के गुणगान में लगा दिया। अब भगत जो चाहते थे वो देखते थे और जो नहीं देखना होता था वो नहीं देखते थे। लेकिन उसी समय एक मिडिया घराना था जो सरकार और धनिकों की मिलीभगत की पोल खोलता रहता था। एंकर खुद को सबसे महंगा जीरो टीआरपी एंकर कहता था, जिसे उसके चेहतों के साथ-साथ उसके विरोधी और सरकारी भगत भी देखते थे। उसका एंकर और मालिक सरकार और धनिकों की किरकिरी बन गये।

एक दिन सरकारी उदारता से बने सर्वाधिक धनिक ने समय और नीतियों का लाभ उठा अंतिम साँस लेते उक्त मिडिया के शेयर खरीद मालिकाना हक की जुगत लगानी शुरू कर दी। अब न सरकार चुप, न  मीडिया चुप और न ही समदर्शी भगत भी चुप रहे। चारों तारफ एक ही सवाल था- अब जीरो टीआरपी एंकर का क्या होगा? हल्ला मच गया। बड़े बड़े कयास लगाये जाने लगे, चर्चा जोरो पर थी कि एंकर का कैरियर तवाह हो जायेगा। भगत कहते न थकते कि अकेला चना कब तक भाड़ फोड़ता? कुछ को यह भी कहते सुना गया कि अब एंकर सरकार की शरण में चला जायेगा। एक जुमला चला- धनिक और सरकार एंकर को न खरीद पाए तो उसके मालिक को खरीद लिया। चर्चा ये भी हुई कि एंकर खुद का मिडिया घराना बना लेगा।

अब तू बता विक्रम - क्या एंकर सरकार और धनिक के सामने घुटने टेक देगा? क्या उसके समर्थक उसके लिए कोई उपाय खोजेंगे या फिर  वह गुफाओं की कंदराओं में जाकर समाधिस्थ हो जायेगा? याद रख- अगर तूने जानते-बूझते जवाब न दिया तो तेरे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे।“

विक्रम ने कहा – “हे बेताल! अंध-भक्ति से अधिक भयानक कुछ नहीं होता। अन्याय और सरकार के जन-विरोधी कार्यों को उजागर करना मीडिया का दायित्व है, उसे बिना लागलपेट के सारी ख़बरें देश और दुनिया के सामने लानी चाहिए। एंकर को बाकायदा घोषणा कर देनी चाहिए कि मेरे चैनल छोड़ने की खबर उतनी ही अनोखी है जितना सरकार प्रमुख का मेरे समाने बैठ साक्षात्कार देना।  समर्थकों और विरोधियों का दायित्व है कि वे विधवा-प्रलाप न करें। धनिकों को मिडिया से अधिक अपने व्यवसाय और व्यवसाय की सुचिता पर अधिक ध्यान देना चाहिए। एंकर को क्या करना है ये उसके विवेक पर छोड़ दिया जाए।“

बेताल बोला-“तू धन्य है विक्रम। तू वाकई सच्चा न्यायप्रिय राजा है। मैं तुझे साधुवाद देता हूँ लेकिन तूने तो सही जवाब दे दिया सो मैं चला।“

यह कहकर बेताल विक्रम के कंधे से उड़ा और फिर उसी पेड़ की उसी डाल पर वापस उल्टा लटक गया।

विक्रम बेताल टॉक "कलयुग में धर्म"

  कलयुग में धर्म - सन्दीप तोमर    ज्यों ही विक्रम ने सबसे ऊँचे टावर से बेताल को उतारकर पीठ पर डाला , वह बोल उठा , ”ये तूने सही किया राजन , ...